Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 50, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 50, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
छिन्नध्वजं छिन्नरथं छिन्नाश्वं छिन्नसारथिम् ।
छिन्नकार्मुकवर्माणं भिन्नसर्वाङ्गमाकुलम् ॥ ४० ॥
हृदि स्फोटशिलापट्टदृढे पीवरमूर्धनि ।
भित्त्वा वज्रसमैर्बाणैः पातयत्येव भूतले ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
हमारे पति को, जिनके रथ की पताका कट गई हे, रथ ध्वस्त हो गये है, घोड़े मर गये हैं,
सारथि कट गया है, धनुष ओर कवच कट गये हैं और सब अंग-प्रत्यंग छिन्न-भिन्न हो गये
है अतएव बड़े घबराये हुए हैं, शिलाफलक के समान दृढ (जिसका फटना संभव नहीं है)
हृदय में और स्थूलतम मस्तक मेँ वज्र के समान कठोर बाणोँसे घायलकर पृथिवी पर गिरा
रहा हे