Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 51, Verses 17–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 51, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 17, 18
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्ता दशदिग्भ्योऽथ प्रवेष्टुं सैन्धवं पुरम् ।
कराः करिहयाकारै रत्नपूरा इवाम्बुधिम् ॥ १७ ॥
निबन्धनानि चिह्नानि शासनानि दिशं प्रति ।
क्षणान्निवेशयामासुर्मण्डलं प्रति मन्त्रिणः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा सिन्धु के नगर में प्रवेश करते ही सिन्धु के नगर में दसों दिशाओं
से कर (भेंट) हाथी घोड़े से यों प्रवेश करने लगे (आने लगे) जैसे समुद्र में रत्नों की राशियाँ
प्रवेश करती हैं । मन्त्रियों ने प्रत्येक दिशा में और प्रत्येक सामन्त (अधीन राजा) के पास
राजकीय नियम, चिह्न और आदेश तुरन्त भेज दिये