Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
भ्रमो दृश्यमसत्तस्य द्रष्टृदृश्यदशा कुतः ।
द्रष्टृदृश्यक्रमाभावादद्वयं सहजं हि तत् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
भ्रम को देखनेवाला दूसरा नहीं है, तो भ्रम ही भ्रम को देखे ? इस पर कहते हैं।
भ्रम असत् दृश्य हे । दृश्य द्रष्टा पुरुष के व्यापार के फल का आधार होता है यानी द्रष्टा जो
कुछ व्यापार करता है उस व्यापार का फल जिसमें रहता है, वह दृश्य हे । अपने मेँ अपने आप
कोई भी व्यापार नहीं कर सकता, क्योकि एकमें कर्तुत्व भी रहे ओर कर्मत्व भी रहे, यह विरुद्ध
है, इसलिए दृश्य भ्रम की द्रष्टा और दृश्य दो दशाएँ नहीं हो सकती हैं । द्रष्टा के अभाव में दृश्य
की सत्ता और स्फूर्ती भी सिद्ध नहीं हो सकती । यह द्रष्टा ओर दृश्य के क्रम का अभाव द्वैतदशा
में दूषण है और अद्वितदशा में तो वह भूषण है, ऐसा कहते हैँ । अद्वैत मेँ द्रष्टा ओर दृश्य के क्रम
का अभाव होने से वहाँ पर स्वभावतः है