Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 52, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 52, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
किल मण्डपगेहान्तः स्वस्वभावोदितात्मनि ।
विहरन्ति जनास्तत्र स्वगेहे स्वव्यवस्थया ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अति अल्प स्थान में बृहत्तर वस्तु का समावेश न हो सकना भी दृश्यका ही दूषण हे ।
स्वाधिष्ठान चैतन्य का दूषण नहीं है, इस आशय से कहते हैं ।
मण्डप गृह के भीतर अपने स्वभाव से उदित आत्मारूप अपने घर में लोग अपने अपने
व्यवहार के अनुकूल प्रशस्त प्रदेश की व्यवस्था कर विहार करते हैं, संचार करते हैं, यह कम
आश्चर्य नहीं