Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
यद्यथा कचितं यत्र व्योमरूप्यपि पार्थिवम् ।
सर्गादौ तस्य चलितुमद्ययावन्न युज्यते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
नियति के अविपयसि में (उलटफेर न होने में) पृथ्वी आदि की स्थिति ही दृष्टान्त है, इस
आशय से कहती है ।
यद्यपि पृथ्वी आदि दृश्य प्रपंच आकाशरूपी (शून्य) है, तथापि वह सृष्टि के आरम्भ में
जहाँ पर जिस रूपसे आविर्भूत हुआ था, वह आज भी अपनी मर्यादा से तनिक विचलित नहीं
हो सकता