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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

जगदादावनुत्पन्नं यच्चेदमनुभूयते । तत्संविद्व्योमकचनं स्वप्नस्त्रीसुरतं यथा ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

ऊपर जो कुछ कहा गया है, वह मायिक दुष्टि का अवलम्बन करके कहा गया है परमार्थ दृष्टि से तो जब जगत्‌ की ही सत्ता नहीं है, तब नियति की क्या कथा है ? इस आशय से कहती हैं । जगत्‌ पहले उत्पन्न ही नहीं हुआ। शंका - यदि जगत्‌ उत्पन्न नहीं हुआ, तो उसका अनुभव कैसे होता है ? समाधान- जो कुछ यह अनुभव में आ रहा है, यह चिदाकाश का ही तादृशरूप से विकास है, स्वप्न में स्त्रीसंग की नाई यानी स्वप्न मेँ जैसे अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य का ही तादृश आकार से स्फुरण होता है, वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिए