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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 55–56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verses 55–56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 55,56

संस्कृत श्लोक

अन्योन्यपुष्टतां यातैर्मोहसंवेदनभ्रमैः । जन्तुः पाषाणतामेति स्थितमित्यादिसर्गतः ॥ ५५ ॥ प्रबुद्धलीलोवाच । व्यथां विमोहं मूर्च्छान्तं भ्रमं व्याधिमचेतनम् । किमर्थमयमायाति देहो ह्यष्टाङ्गवानपि ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

मोह यानी अपने स्वरूप का परिचय न रहना, संवेदन यानी विषयवासनाएँ ओर भ्रम यानी अन्यथा ज्ञान ये जब एक दूसरे से पुष्ट होते हैं, तब इनसे जीव पाषाणता को (पाषाण की नाई जडता को) प्राप्त होता है, यह नियम आदि सृष्टि से चला आ रहा हे । प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवि, सिर, हाथ, चरण, मलमूत्रके द्वार, नाभि ओर हृदय इन आठ अंगों से युक्त यह देह भी पीडा, मोह, मूर्छा, भरम, व्याधि ओर अचेतना को क्यो प्राप्त होता है