Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verses 6–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 6-8
संस्कृत श्लोक
कथं स्वभावसंसिद्धिः कथं सत्ता पदार्थगा ।
कथमग्न्यादिपूष्णत्वं पृथ्व्यादौ स्थिरता कथम् ॥ ६ ॥
हिमादिषु कथं शैत्यं का सत्ता कालखादिषु ।
भावाभावग्रहोत्सर्गस्थूलसूक्ष्मदृशः कथम् ॥ ७ ॥
कथमत्यन्तमुच्छ्रायं तृणगुल्मनरादिकम् ।
वस्तु नायात्यनिष्टेऽपि स्थिते स्वोच्छ्रायकारणे ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोड कहे कि नियम न हो, अनियम ही रहे, तो इस पर कहते है ।
यदि अनियम मानोगे, तो जल का शीतलता ही स्वभाव, अग्नि का उष्णता ही स्वभाव
इत्यादि की सिद्धि कैसे होगी ? घटादि पदार्थों में रहनेवाली सत्ता (भावरूपता का नियम) कैसे
होगी, अग्नि आदि में उष्णता और पृथ्वी आदि में स्थिरता कैसे होगी हिम आदि में शीतलता
कैसे होगी, काल, आकाश आदि की नित्यता कैसे होगी, भाव का (सत्य रजत आदि का)
ग्रहण, अभाव (शुक्ति रजत आदि का) त्याग कैसे होगा पृथिवी आदि की स्थूलता ओर
मन, इन्द्रिय आदि की सूक्ष्मता ही है, इन नियमों का दर्शन कैसे होगा अपनी ऊँचाई के
कारण के रहते भी तिनका, आडी, मनुष्य आदि वस्तुओं शाल, तमाल आदि वृक्षों के तुल्य
अत्यंत ऊँचाई को नहीं पाती, इष्ट अनिष्ट सभी जगह नियमन होने से सर्वत्र अविश्वास ही
क्यों न होगा ?