Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
संविदो वेदनं नाम स्वभावोऽव्यतिरेकवान् ।
तस्मात्स्वभावसंवित्तेर्नान्ये मरणजन्मनी ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्यायुक्त जीवचैतन्य के स्वरूप का विचार करने पर भी यही प्रतीत होता है कि जबतक
मोक्ष न हो जाय, तब तक जन्म, मरण आदि की निवृत्ति नहीं होती, ऐसा कहते है ।
संवित् का वेदन यानि स्वभाव व्यतिरेकरहित (विश्लेषशून्य) है, इसलिए जन्म ओर मरण
स्वभावसंवति से पृथक् नहीं है यानी जब तक आविधक जीवचैतन्य रहेगा, तब तक जन्म ओर
मरण से छुटकारा नहीं है, वे उसके स्वभावरूप ही है, हाँ, मुक्ति होने पर काल के साथ ही
उनसे छुटकारा होता है