Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 54, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 54, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
ईदृशेन मयेहेत्थं भाव्यमित्यादि सर्गजा ।
संविद्वीजकला नाशं न कदाचन गच्छति ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि उक्त नियति का नाश होने पर जगत् के व्यवहार का ही भग हो जायेगा ।
इस पर कहती है ।
“इस प्रकार का जो मेँ हूँ, मुझे इस स्थान में इस प्रकार जन्म लेना होगा, इस आकारवाली
आदि सृष्टि में उत्पन्न हुई सत्यसंकल्प के संस्कार से युक्त माया कभी भी नाश को नहीं
प्राप्त होती, मुक्ति होने पर काल के साथ ही उसकी भी निवृत्ति होती है, उससे पूर्व नहीं,
यह भाव हे