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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

प्रबुद्धलीलोवाच । यथैव जन्तुर्म्रियते जायते च यथा पुनः । तन्मे कथय देवेशि पुनर्बोधविवृद्धये ॥ १ ॥ श्रीदेव्युवाच । नाडीप्रवाहे विधुरे यदा वातविसंस्थितिम् । जन्तुः प्राप्नोति हि तदा शाम्यतीवास्य चेतना ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवेशि, जैसे जन्तु (प्राणी) मरता है और जैसे फिर पैदा होता है, उसीको (पूर्वकथित को ही) फिर आप मुझसे विस्तार से कहिये उसका परिणाम यह होगा कि वारवार सुनने से वैराग्य बढ़ेगा और उससे ज्ञान की वृद्धि होगी । श्री देवीजी ने कहा : भद्रे, नाडियों की गति रूक जानेपर जब कि प्राणी प्राणवायुओं की विसंरिथति (चलनस्वभाव से विपरीत स्थिति) अर्थात्‌ गत्यवरोध को प्राप्त होता है, तब उसकी चेतना शक्ति, अन्तःकरणरूप उपाधि का लय हो जाने से, शान्त-सी हो जाती हे

सर्ग सन्दर्भ

चौवनवाँ सर्ग समाप्त पचपनवाँ सर्गं आदि सृष्टि से लेकर जीव की विचित्र संसारगतियों का तथा जीवकमनुसारी ईश्वर की स्थिति का वर्णन |