Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
शुद्धं हि चेतनं नित्यं नोदेति न च शाम्यति ।
स्थावरे जङ्गमे व्योम्नि शैलेऽग्नौ पवने स्थितम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वस्तुतः चेतना कहीं शान्त नहीं होती है, ऐसा कहते हैं ।
चेतन मल के सम्पर्क से रहित तथा नित्य है, न तो उसका उदय होता है और न विनाश |
वह चर-अचर सब जीवों में, आकाश में, पर्वत में, अग्नि में और वायु में स्थित है मतलब यह
कि कोई पदार्थ या स्थान उससे शून्य नहीं है