Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 10–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verses 10–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 10-12
संस्कृत श्लोक
आत्मन्यस्ति घटापुष्टमन्यस्य व्योम केवलम् ।
आकाशभूतले साकं साकाशशशिवासरम् ॥ १० ॥
भवन्ति षड्विधाः प्रेतास्तेषां भेदमिमं श्रृणु ।
सामान्यपापिनो मध्यपापिनः स्थूलपापिनः ॥ ११ ॥
सामान्यधर्मा मध्यमधर्मा चोत्तमधर्मवान् ।
एतेषां कस्यचिद्भेदो द्वौ त्रयोऽप्यथ कस्यचित् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोड कहे कि छोटे से मरण-प्रदेशर्में यथा कथंचित् अन्य शरीर की कल्पना हो सकने
पर भी दूरगमन, विस्तारयुक्त परलोक आदि का समावेश वहाँ कैसे हो सकता है ? तो इस पर
कहते हैं।
आत्मा में विपुल एक आकाश अथवा आकाश और पृथ्वी दोनों ही या करोड़ों लाख ब्रह्माण्ड
एक साथ एक ही समय समा सकते हैं, फिर आत्मा में इस सम्पूर्ण प्रपंच का सम्भव क्यों नहीं
होगा ? अर्थात् अवश्य है ही, क्योंकि आत्मा असीम है और माया अघटितघटनामें पट् है। ऐसी
स्थिति में आत्मस्वरूप का विचार कर अत्यल्प प्रदेश में भी अन्य लोक का (परलोक आदि
का) समावेश कहा गया है, केवल उसी प्रदेश के अभिप्राय से नहीं कहा है (५) ।
अब भिन्न-भिन्न गति को कहने के लिए देवीजी प्रेतो का विभाग करती हैं -
हे सुन्दरी, प्रेत छः प्रकार के होते हैं, उनके आगे कहे जानेवाले भेद को सुनो-साधारण
पापी, मध्यम पापी और बड़े भारी पापी, साधारण धर्म वाले, मध्यम धर्मवाले तथा उत्तम
धर्मवाले। इनमें से प्रत्येक में किसी के दो भेद होते हैं और किसीके तीन भेद होते है