Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
कश्चिन्महापातकवान्वत्सरं स्मृतिमूर्च्छनम् ।
विमूढोऽनुभवत्यन्तः पाषाणहृदयोपमः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उनमें से पहले और तीसरे की गति कहते है।
कोई बड़ा भारी पातकी एक वर्ष तक मरणमूर्छा का अनुभव करता है, पत्थर के मध्य की
नाई ठोस ओर मूढ रहता है