Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
ततः कालेन संबुद्धो वासनाजठरोदितम् ।
अनुभूय चिरं कालं नारकं दुःखमक्षयम् ॥ १४ ॥
भुक्त्वा योनिशतान्युच्चैर्दुःखाद्दुःखान्तरं गतः ।
कदाचिच्छममायाति संसारस्वप्नसंभ्रमे ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
बहुत समय के बाद चेतना को प्राप्त होकर चिरकाल तक
वासनारूपी नायिका के उदर से उत्पन्न होकर कभी नष्ट न होनेवाले नारकीय दुःख का भोगकर
म इस श्लोक का द्वितीय अर्थ यों है - यदि उस प्रदेश में मार्ग, परलोक आदि हैं, तो उन्हें दूसरे
लोग क्यो नहीं देखते, मृतक ही क्यों देखता है आकाश और पृथ्वी दो, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा
आदि से युक्त सारा जगत् मृत परुष की आत्मा में मेघघटा की नाई खूब पुष्ट हुआ है, अन्य की दृष्टि
से तो केवल आकाश ही है, अतः अन्य को नहीं दिखाई देते हैँ ।
एक दुःख के बाद दूसरे दुःख को प्राप्त होता हुआ वह महापापी सैकड़ों योनियों को खूब
भोगकर कभी संसाररूपी स्वप्न में शान्ति को (महापापों के फलकी समाप्ति को) प्राप्त होता
है, यानी उसके पापफलों का अन्त होता है