Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
अथवा मृतिमोहान्ते जडदुःखशताकुलाम् ।
क्षणाद्वृक्षादितामेव हृत्स्थामनुभवन्ति ते ॥ १६ ॥
स्ववासनानुरूपाणि दुःखानि नरके पुनः ।
अनुभूयाथ योनीषु जायन्ते भूतले चिरात् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा वे मृत्यु-मोह के अन्त में
सैकड़ों जड-दुःखों से व्याकुल वृक्ष आदि योनियों का, जो कि उसके हृदय में स्थित है, भोग
करते हैं और फिर नरक में अपनी-अपनी वासनाओं के अनुरूप विविध दुःखों का अनुभव कर
चिरकाल तक भूतल में विविध योनियों में उत्पन्न होते हैं