Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अयं शालिरहं जातः क्रमात्फलमहं स्थितः ।
इत्युदर्कप्रबोधेन बुध्यमानो भविष्यति ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
“मुझे यमराज ने अपने कर्मों के फलों का भोग करने के लिए इस दिशा में जाने की
आज्ञा दी है, इसलिए यमसभा से मैं शीघ्र सुन्दर सुन्दर भोगों से युक्त स्वर्ग में जाता हूँ या नरक
में ही जाता हूँ ॥ ३ ५॥ यमराज ने जिस स्वर्ग का भोग करने के लिए मुझे आज्ञा दी थी उस (स्वर्ग)
का मैंने भोग कर लिया है अथवा यमराज ने जिस नरक का भोग करने के लिए मुझे आदेश दिया
था उसका मैंने भोग कर लिया हे । यमनिर्दिष्ट ये पशु आदि योनियाँ मैंने भोग ली हैं। इस समय
मैं मनुष्य संसार में आविर्भूत होता हूँ ॥ ३ ६॥ यह मैं कभी धान का अंकुर हुआ, फिर बढ़कर पौधा
हुआ, पत्ते लगे, गाभ हुआ, धान की बाल हुआ, इस क्रम से बीज बनकर रहा ।
शंका-स्वर्ग, नरक और विविध योनियों के भोग की नाई व्रीह्यादिभाव (धान के अंकुर
आदि होना) भी क्या उसका अनुभव सिद्ध है ?
समाधान - नहीं, भविष्यकाल में प्राप्त होनेवाले मनुष्य शरीर में श्रुति, पुराण आदि से
उत्पन्न बोध से उसे अपने व्रीह्यादिभाव का परिज्ञान होता है