Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 34–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
आकाश इव निःशून्ये शून्यात्मैव विबोधवान् ।
देशकालक्रियादैर्घ्यभासुरोऽपि न किंचन ॥ ३४ ॥
इतोऽयमहमादिष्टः स्वकर्मफलभोजने ।
गच्छाम्याशु शुभं स्वर्गमितो नरकमेव च ॥ ३५ ॥
यः स्वर्गोऽयं मया भुक्तो भुक्तोऽयं नरकोऽथ वा ।
इमास्ता योनयो भुक्ता जायेऽहं संसृतौ पुनः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
परमार्थद्रष्टि से यदि देखा जाय, तो आत्मा से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।
आकाश की नाई स्वरूपरहित में स्थित जगत्-प्रपंच, जिसमें लम्बे देश, लम्बे काल और
लम्बी क्रियाओं की प्रतीति होती है, कुछ भी नहीं है, किन्तु सम्पूर्ण अध्यारोपों से शून्य आत्मा
ही है