Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
इति प्रत्येकमभ्येति पृथुः संसारखण्डकः ।
यथासंस्थितनिःशेषपदार्थाचारभासुरः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अध्यारोपक्रम स्वप्न के समान प्रत्येक पुरुष का भिन्न भिन्न है, ऐसा कहते हैँ ।
जैसे प्रतीत होते हैं, वैसे ही स्थित यानी सत्य-से सब घट, पट आदि पदार्थ ओर उनकी
तत्-तत् अर्थ क्रिया (जल का आनयन आदि) से देदीप्यमान, विशाल संसारभाग प्रत्येक को
प्राप्त होता है