Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
प्रबुद्धलीलोवाच ।
आदिसर्गे यथा देवि भ्रम एष प्रवर्तते ।
तथा कथय मे भूयः प्रसादाद्वोधवृद्धये ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
त्वं पदार्थ जीव में भ्रान्ति हो सकती है, इसलिए उसमें भले ही यह अध्यारोपक्रम हो,
तत्पवार्थ ईश्वर में तो भ्रान्ति हो नहीं सकती, अतः उसमें जगत् का अध्यारोपक्रम कैसे ? इस
प्रकार तत्पदार्थ ईश्वर की शुद्धि को जानने के लिए लीला पूछती है ।
प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवि, आदि सृष्टि में जैसे यह भ्रम होता है, वैसा मुझसे कृपापूर्वक
पुनः कहिये, जिससे कि मेरे बोध की वृद्धि हो