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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verses 46–47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 46,47

संस्कृत श्लोक

सर्वात्मकत्वात्स यतो यथोदेति चिदीश्वरः । परमाकाशशुद्धात्मा तत्र तत्र भवेत्तथा ॥ ४६ ॥ सर्गादौ स्वप्नपुरुषन्यायेनादिप्रजापतिः । यथा स्फुटं प्रकचितस्तथाद्यापि स्थिता स्थितिः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वस्वरूप होने के कारण उस चिदात्मा परमेश्वर का जहाँ पर जैसा विवर्त होता ह, परमाकाश शुद्धस्वरूप वह ईश्वर ही वहाँ वहाँ पर हम लोगों की दृष्टि से स्वप्न की कल्पना करनेवाले पुरूष की नाई जीवसमष्टिरूप आदि प्रजापति बनकर सृष्टि करने योग्य पदार्थो के संकल्परूप से जैसे भी आदि लोकरूप विवर्त से स्फुरित हुआ, वैसे ही आज भी व्यवस्था ज्यो-की त्यों स्थित हे