Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
नरोपाधिपुरं प्राप्तं चेतत्यक्षिपुटं नयत् ।
तत्तस्या नाक्षिचिज्जीवं नो जीवत्येव सर्गतः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका बुद्धि के द्वारा स्थूल में प्रवेश और स्थूल में चक्षु आदि की प्राप्ति होने से बाह्य
व्यवहार की क्षमता आती है, ऐसा कहती है।
बुद्धि में प्रविष्ट हुआ चिदाकाश बुद्धि के लिए मनुष्यशरीररूप दूसरे उपाधिभूत नगर में
प्रविष्ट होकर अपने में अधिरूढ बुद्धि को चक्षु आदि के गोलक में पहुँचता हुआ चाक्षुष आदि
बुद्धिवृत्तियों द्वारा बाह्य पदार्थों का अनुभव करता है।
शंका ~ चक्षु आदि ही साक्षात् चित् में अध्यस्त होने से चित् (चेतन) है, अतः वे जीवभूत
शरीर में रहकर व्यवहार करें, बुद्धिरुप उपाधि से युक्त जीव मानने की क्या आवश्यकता है ?
समाधान - नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वयं ही चेतन जीवभूत नहीं है,
क्योंकि चैतन्य में अध्यारोपमात्र से ही कोई चेतन नहीं होता । यदि ऐसा माना जाय, तो घट
आदि पदार्थ को भी चेतन मानना होगा