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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

चित्तं तु परमार्थेन स्थावरे जंगमे स्थितम् । चोपनान्यनिलैरेव भवन्ति न भवन्ति च ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

(चेष्टाएँ) होते हैं और स्थावर में नहीं होते