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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

एवं भ्रान्तिमये विश्वे पदार्थाः संविदंशवः । सर्गादिषु यथैवासंस्तथैवाद्यापि संस्थिताः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस नियम में भी पूर्वकथित नियति ही हेतु है, ऐसा कहते हैं । भ्रान्तिमय विश्व में इस प्रकार के चेष्टायुक्त या चेष्टाशून्य सब पदार्थ सृष्टि के आदि से संवित्‌ में किरणों की नाई स्फुरित हुए थे, वे आज भी वैसे ही स्थित हैं