Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 1–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 1–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 1-5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतस्मिन्नन्तरे राजा परिवृत्ताक्षितारकः ।
बभूवैकतनुप्राणशेषः शुष्कसिताधरः ॥ १ ॥
जीर्णपर्णसवर्णाभः क्षीणपाण्डुमुखच्छविः ।
भृङ्गध्वनितसच्छायश्वासकूजाविकूणितः ॥ २ ॥
महामरणमूर्च्छान्धकूपे निपतिताशयः ।
अन्तर्निलीननिःशेषनेत्रादीन्द्रियवृत्तिमान् ॥ ३ ॥
चित्रन्यस्त इवाकारमात्रदृश्यो विचेतनः ।
निःस्पन्दसर्वावयवः समुत्कीर्ण इवोपले ॥ ४ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन तनुदेशेन तं जहौ ।
प्राणः पिपतिषुं वृक्षं स्वं पक्षीवान्तरिक्षगः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
पचपनवाँ सर्म समाप्त
छप्पनवाँ सर्ग
राजा विदूरथ का वासनामय यमपुरी मेँ गमन, लीला और सरस्वती देवीजी द्वारा
उसका अनुगमन और पूर्व शरीर की प्राप्ति का वर्णन ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस बीचमें राजा विदूरथ के नेत्र स्पन्दशून्य
हो गये थे, ओठ सूख गये ओर सफेद हो गये थे । तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों के मूर्छित होने पर केवल
एक तनिक प्राण ही उसके शरीर में अवशिष्ट रह गया था । उसकी कान्ति पुराने पत्ते के समान
पीली पड गई थी ओर मुख की छवि नष्ट हो गई थी तथा भँवरे की ध्वनि के तुल्य श्वासध्वनि
से वह मुखरित था । मरणमूर्छारूपी महान् अन्धकारपूर्णं कुएँ में उसका मन डूब गया था,
उसकी नेत्र आदि सम्पूर्ण इन्द्रियों की वृत्तियाँ अन्दर लीन हो गई थी, वह चेतनाशून्य था ।
चित्रलिखित पुरुष की नाई उसका केवल आकार ही शेष रह गया था पत्थर में खुदी हुई मूर्ति
की नाई उसके सम्पूर्ण अवयव निश्चेष्ट थे । बहुत क्या कहें, जैसे आकाश में उडनेवाला पक्षी
गिरनेवाले अपने निवासभूत वृक्ष को छोड देता है, वैसे ही प्राण ने उत्क्रमण करने के लिए
अवलम्बित थोड़े से ही प्रदेश से उस राजा के शरीर को छोड दिया