Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
अपश्यत्पुरुषान्याम्यान्नीयमानं च तैर्वपुः ।
बन्धुपिण्डप्रदानेन शरीरं जातमात्मनः ॥ १० ॥
मार्गे कर्मफलोल्लासमतिदूरतरे स्थितम् ।
वैवस्वतपुरं प्राप जन्तुभिः परिवेष्टितम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उसने यम के दूतों को और उनसे ले जाये जा रहे अपने
वासनामय शरीर को देखा तथा बन्धुओं के और्ध्वदेहिक पिण्डप्रदान से उत्पन्न हुए-से अपने
स्थूल शरीर को देखा । तदनन्तर वह अतिदूर (जिसकी यात्रा एक वर्षमें पूरी होती है) दक्षिण
मार्ग में स्थित तथा प्राणियों के कर्मफलों को प्रकट करनेवाली यमपुरी में पहुँचा, जो कि बहुत
से प्राणियों से घिरी थी