Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 24–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 24–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
नरो यथैकदेशस्थो दूरदेशान्तरस्थितम् ।
संपश्यति निधानं स्वं मनसानारतं सदा ॥ २४ ॥
तथा स्ववासनान्तस्थमभीष्टं परिपश्यति ।
जीवो जातिशताढ्योऽपि भ्रमे परिगतोऽपि सन् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अन्य स्थान में स्थित पुरूष दूर देशान्तर में स्थित अपने निधान
की (भूमि में गाढे हुए धन की) निरन्तर सदा मन से भावना करता हुआ भलीभाँति देखता
रहता है, वैसे ही सैकड़ों जातियों से युक्त भी और भ्रम में पड़ा हुआ भी जीव अपनी वासना के
अन्दर अन्तर्हित अपने अभीष्ट को देखता हे