Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
चिदेव वासना सैव धत्ते स्वप्न इवार्थताम् ।
कार्यकारणतां याति सैवागत्येव तिष्ठति ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार शुद्ध चिन्मात्र ही भ्रान्ति से वासना ओर वासनाजन्य जगद्रूपसे भास्रित होता
है, यह कहते हैं।
चिन्मात्र ही वासना का रूप धारण करता है, चेतन जैसे स्वप्न में पदार्थो का रूप धारण
कर लेता है, वैसे ही वह चिति ही पदार्थो के रूप को धारण करती है । वही कार्यकारणता को
प्राप्त होती हे, वही गमनरहित होकर स्थित होती है यानी स्थावररूप से स्थिर होती हे