Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
धर्मो नास्ति ममेत्येव यः प्रेतो वासनान्वितः ।
तस्य चेत्सुहृदा भूरिधर्मः कृत्वा समर्पितः ॥ ३५ ॥
तत्तदात्र स किं धर्मो नष्टः स्यादुत वा न वा ।
सत्यार्था वाप्यसत्यार्था भावना किं बलाधिका ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
"सपिण्डोऽस्मीति संवित्या“ (मैं सपिण्ड हूँ यानी पिण्डग्रदान से युक्त हूँ, इस भावना से)
इत्यादि से पहले जो यह कहा था कि प्रेत की वासना के अनुसार ही प्रेत को शरीर आदि फल
प्राप्त होता है, उसमें आगे किये जानेवाले आक्षेपों की गुंजाइश होने से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, जो मैंने पुण्यकर्म नहीं किये, अतः मेरे पास धर्म नहीं
है, इस भावना से युक्त होकर मरा, उसके बन्धु-बान्धव यदि प्रचुर कर्म करके उसके अर्पण
कर दे, तो वह धर्म, प्रेतवासना से विरोध होने के कारण, निष्फल हो जायेगा । अथवा
बन्धु-बान्धुवों की वासना के प्रबल होने से निष्फल नहीं होगा । उन दोनों वासनाओं में
सुहृद-वासना, धर्म होनेसे, सत्य है और प्रेत की वासना असत्य है, वासना की प्रबलता में
प्रयोजक क्या है ? भोक्तृनिष्ठता या सत्यार्थता यानी भोक्ता में स्थित वासना बलवती हे
या सत्य वासना बलवती है । प्रथम पक्ष में यानी प्रेत की वासना को प्रबल मानो, तो
कृतहानि दोष होगा यानी बान्धवो द्वारा किया गया धर्म निष्फल हो जायेगा । यदि बन्धु-
बान्धवो की वासना प्रबल है, तो अर्थ की सत्यता हुई और वासना कोई वस्तु नहीं रही ।
वासना से ही सब कुछ होता है, यह जो पूर्वं मेँ कहा था, उसका व्याघात होगा, इस प्रकार
उभयतः पाशा रज्जु है, यह आशय हे