Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 42–45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 42–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 42-45
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेतन्महाबाहो सत्यात्मन्न कदाचन ।
महाप्रलयसर्गादौ देशकालौ न कौचन ॥ ४२ ॥
सहकारिकारणानामभावे सति दृश्यधीः ।
नेयमस्ति न चोत्पन्ना न च स्फुरति काचन ॥ ४३ ॥
दृश्यस्यासंभवादेव किंचिद्यद्दृश्यते त्विदम् ।
तद्ब्रह्मैव स्वचिद्रूपं स्थितमित्थमनामयम् ॥ ४४ ॥
एतच्चाग्रे युक्तिशतैः कथयिष्याम एव ते ।
एतदर्थं प्रयत्नोऽयं वर्तमानकथां श्रृणु ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
आपने जो मेरे प्रति कहा वह अभीष्ट ही है, विरुद्ध नहीं है। “न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो
न च साधक : । न मुमु्चनवि मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ (न प्रलय है, न सृष्टि है, न कोर्ड बद्ध
है, न साधक है, न मुयुश्च है ओर न मुक्त है, यही परमार्थता है) तदेतद्वह्मापूर्वमन पर”
(कारण रहित, कार्यरहति, अस्थूल) अनणु ओर अहस्व ब्रह्म है) इत्यादि अनेक श्रुतियों का
जगत् की अनुत्पत्ति में तात्पर्य दिखाई देता है, बड़े भारी प्रयत्न से इसी अर्थ का बोध कराना
अभीष्ट भी है। "सोऽकामयत बहु स्याम्“ इत्यादि सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियों का भी प्रतीत हो रहे
दवेत की असत्यता का उपपादनपूर्वक पहले उपक्रान्त मुक्तिफल देनेवाले निष्प्रपंच आत्मा का
ज्ञान कराने में ही तात्पर्य है । सृष्टि आदि में तात्पर्य नहीं है, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी के
कथन का अनुमोदन करते हुए श्रीवकिष्ठजी ने कहा ।
श्रीरामचन्द्रजी, जो तुम यह कहते हो, वह ठीक ऐसा ही हे, महाप्रलयरूप सृष्टि के
आदिभूत परमार्थ सत्य आत्मा में कोई भी देश, काल कभी नहीं थे । सहकारी कारणों का
अभाव होने पर यह दुश्यप्रतीति नहीं है, न तो यह कभी उत्पन्न हुई, न कभी इसका स्फुरण
होता है; यों दृश्य का सम्भव न होने से ही यह जो कुछ भी दिखाई देता है, वह स्वचिद्रूप
निर्विकार ब्रह्म ही इस रूप में है, ब्रह्म से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । इस बात को हम आगे
आपसे सैकड़ों युक्तियों से कहेंगे ही, इसीलिए यह हमारा प्रयास है फिलहाल आप
वर्तमान कथा को पूरी सुन लीजिये