Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 46–49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 46–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 46-49
संस्कृत श्लोक
एवं ददृशतुः प्राप्ते मन्दिरं सुन्दरोदरम् ।
कीर्णं पुष्पोपहारेण वसन्तमिव शीतलम् ॥ ४६ ॥
प्रशान्ताचारसंरम्भराजधान्या समन्वितम् ।
मन्दारकुन्दमाल्यादिशवं तत्र समं स्थितम् ॥ ४७ ॥
मन्दारकुन्दस्रग्दामवृताम्वरबृहच्छवम् ।
शवशय्याशिरःस्थाग्र्यपूर्णकुम्भादिमङ्गलम् ॥ ४८ ॥
अनिवृत्तगृहद्वारगवाक्षकठिनार्गलम् ।
प्रशाम्यद्दीपकालोकश्यामलामलभित्तिकम् ।
गृहैकदेशसंसुप्तमुखश्वाससमीकृतम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्ववर्णित प्रणाली से राजा पद्म के नगर में आयी हुई लीला और सरस्वती देवीजी ने राजा
पद्म के महल को देखा । उसका भीतर का भाग अत्यन्त मनोरम था, चारों और फूलमालाएँ
बिखरी थी, अतएव वसन्त के समान शीतल था, राजधानी के लोगों से, जिनकी राजकार्य
करने की फूर्ती ढीली पड़ गई थी, वह राजप्रासाद युक्त था । उस राजमहल में उन
राजकर्मचारियों के साथ रक्खे हुए मन्दार, कुन्द आदि की मालाओं और फूलों से ढँके हुए शव
को भी उन्हों ने देखा, उस महल में मन्दार और कुन्द के फूलों की मालाओं से ढँका हुआ वस्त्रों
से लपेटा हुआ शव रक्खा था, शव की शय्या के सिरहाने पर सुन्दर पूर्ण कुम्भ आदि मांगलिक
पदार्थ रक्खे थे, घर के दरवाजे और खिड़कियों की अर्गलाएँ बन्द थी, दीपकों का उजियाला
मन्द पड़ रहा था, अतएव स्फटिक की भाँति साफ सुथरी गृहभित्तियाँ कुछ मैली हो गई थी, घर
के एक भाग में, सोये हुए लोगों के मुख के निःश्वास से वह महल व्याप्त था