Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
संपूर्णचन्द्रसकलोदयकान्तिकान्तं सौन्दर्यनिर्जितपुरन्दरमन्दिरर्द्धि ।
वैरिञ्चपद्ममुकुलान्तरचारुशोभं निःशब्दमन्दमिव निर्मलमिन्दुकान्तम् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
वह
महल सम्पूर्ण चन्द्रमा के कलासहित उदय प्रकाशित होने के कारण बाहर बड़ा सुन्दर था,
उसने अपनी सुन्दरता से इन्द्रभवन की सौन्दर्यसमृद्धि को जीत लिया था और भीतर ब्रह्मा के
उत्पत्तिकमल के (भगवान के नाभिकमल की कंठी के) मध्य के समान सुन्दर था शब्दशून्य
होने के कारण मूक-सा (गूँगे सा) स्थित था और चन्द्रमा के समान रमणीय था