Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
ब्रह्मँल्लोकैः पुरस्थस्य गच्छतो योगिनो निजम् ।
आतिवाहिकतां देहः कीदृशोऽयं विलोक्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
नहीं है तो जब वह जीवित रहता है या आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है यानी मुक्ति को प्राप्त
होता है अथवा मर जाता है, तो आतिवाहिकता को प्राप्त हुए उसके शरीर को लोग कैसे
देखते हैं न तो आतिवाहिक शरीर लोगों के दृष्टिगोचर होता है और न मुक्तिकाल में
अवशिष्ट ही रहता है