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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । देहाद्देहान्तरप्राप्तिः पूर्वदेहं विना सदा । आतिवाहिकदेहेऽस्मिन्स्वप्नेष्विव विनश्वरी ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

योगियों का मरना दो प्रकार का होता है एक तो प्रारब्धभोग के लिए अपनी इच्छानुसार विविध शरीरो की कल्पना और दूसरा सम्पूर्ण प्रारब्ध का विनाश होने पर विदेहकैवल्य की प्राप्ति । प्रथम मरण में पूर्वशेष नहीं रहता, ऐसा कहते है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जैसे स्वप्नो में, आतिवाहिक देहमें एक देह का (मृग भावका) त्याग कर अन्य देह की (मनुष्यादि भाव की) कल्पना, जो कि अनित्य हे, पूर्वदेह के परिशेष के बिना ही होती है वैसे योगियों को भी प्रारब्ध भोग के लिए एक देह से दूसरी देह की प्राप्ति सदा पूर्वदेह के परिशेष के विना ही होती हे