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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

यथातपे हिमकणः शरद्व्योम्नि सितोऽम्बुदः । दृश्यमानोऽप्यदृश्यत्वमित्येवं योगिदेहकः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरे में भी पूर्वदेह का परिशेष नहीं रहता है, यह दरष्टान्तपूर्वक कहते है । जैसे धूप में हिमकण, शरत्काल के आकाश में सफेद मेघ यद्यपि दिखाई देता है वैसे ही योगी का शरीर भी दिखाई देता हुआ भी अदृश्यताको प्राप्त होता है यानी उसके भी परिशेष का भ्रम स्वल्पकालव्यापी होता है