Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
द्रागित्येवाथवा कश्चिद्योगिदेहो न लक्ष्यते ।
योगिभिश्च पुरो वेगात्प्रोड्डीन इव खे खगः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
धीरे-धीरे क्षय को प्राप्त होता है ओर अन्य लोग उसे देखते हैं, इसमें भी कोई नियम नहीं
है, क्योकि किन्हीं योगियो के इसका तुरन्त नाश हो“ इस प्रकार के संकल्प से उसका तुरन्त
नाश होना भी असंभव नहीं है, ऐसा कहते है ।
“तुरन्त नष्ट हो जा", ऐसे संकल्प से किसी योगी का शरीर, आकाश में अपने सामने से
वेग के साथ उड़े हुए पक्षी के समान योगियों को भी नहीं दिखाई देता साधारण लोगों की तो
बात ही क्या है ? जीवनावस्था में भी ये मुझे ऐसा देखें” ऐसे उसके (योगी के) सत्यसंकल्पवश
ही लोग योगी की देह को देखते हैं न कि उसकी देह के आधिभौतिक होने के कारण देखते हैं,
यह तात्पर्य है