Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
संदेहः क इवात्रैषां पशवो ह्यविवेकिनः ।
यथादृष्टं विचेष्टन्ते कुत एषां विचारणा ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह शंका हो कि दूसरी लीला पहले- पहल आई थी, अतः उसके विषय में यह कौन
है, कहाँ से आईं है, यह सुचरित्र है या व्यभिचारिणी है, सत्य है या असत्य है, ऐसा सन्देह उन
लोगों को क्यो नहीं हुआ ? उस पर कहते हैं ।
४५ ऐसी स्मृति स्वप्न में योगियों को ही होती है, उन्हींके अनुभव से सिद्ध है । पामर पुरुषों के
अनुभव से सिद्ध नहीं है ।
यहाँ पर इनको सन्देह कौन-सा होगा ? क्योकि पशु तो अविवेकी होते ही हैं, जैसा देखा
उसीके अनुसार व्यवहार करने लगते हैँ । इनको विचार ही कहाँ ?