Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

यथा लोष्टो लुठद्वृक्षं वञ्चयित्वाशु गच्छति । अज्ञानत्वेऽजपशवस्तथा ह्यस्ति पुरादिकम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

उनके विचार के अनुदय में हेतु क्या है, ऐसा यदि कोड कहे, तो स्थूल मे अभिनिवेश तथा सार, दार्व्य, सूक्ष्मता आदि से शून्यता हेतु है, ऐसा दृष्टान्त से सूचित करते हैं। जैसे वृक्ष को नष्ट करने के लिए जोर से फेंका गया ढेला वृक्ष में पहुँचकर स्वयं अपना ही नाश करता है बाण की नाईं भीतर नहीं घुसता और न कीचड़ के पिण्ड की नाईं वृक्ष से चिपट जाता है और न पत्थर के समान तनिक भी आघात पहुँचाकर स्वयं फिर उपघात के योग्य ही बना रहता है, किन्तु शीघ्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही वे लोग भी, ज्ञान न होने के कारण, वस्तुतः पशु (अजारूप पशु) यानी विचार करने में असमर्थ हैं, क्योंकि “अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते” (जो अन्य देवता की उपासना करता है, यह अन्य है और मैं अन्य हूँ इस प्रकार वह पशु की भाँति अज्ञानी है) ऐसी श्रुति है । उनके विचार के अनुदय में केवल अज्ञान ही कारण नहीं है, किन्तु शरीर, काम, कर्म, वासना आदि भी उनके पशु के तुल्य ही होते हैं, इसलिए उनमें विचार का उदय न होना ठीक ही है