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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

यथा स्वप्नवपुर्बोधान्न जाने क्वेव गच्छति । असत्यमेव तद्यस्मात्तथैवेहाधिभौतिकम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

जो विचार करते हैं, उनमें क्रमशः आधिभौतिकता की प्रतीति बोध से बाधित हो जाती है, अतः उनमें आधिभौतिकता की प्रतीति रहती नहीं फिर सन्देह आदि की प्रसक्ति तो दूर रही, इस आशय से उपसंहार करते है । जैसे स्वप्नशरीर बोध से (जागरण से) न जाने कहाँ चला जाता है, अत: वह असत्य ही है वैसे ही आधिभौतिक भी बोध होने पर कहीं चला जाता है यानी विलीन हो जाता है, अतः वह भी असत्य ही है