Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अस्पन्दस्य यथा वायोः सस्पन्दोऽन्तर्विशत्यलम् ।
अनन्यात्मा तथैवायं स्वप्नार्थः संविदो मलम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्पन्दरहित वायु के अन्दर वह
स्पन्द विलीन हो जाता है वैसे ही अनन्यस्वरूप (अन्य तात्त्विक स्वरूपहीन) ये स्वाप्निक
पदार्थ संवित् के मलकी नाई आवरक अपने उपादानभूत अज्ञान में ही प्रवेश करते हैं