Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
मिथ्यादृष्टय एवेमाः सृष्टयो मोहदृष्टयः ।
मायामात्रदृशो भ्रान्तिः शून्याः स्वप्नानुभूतयः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ को अनुमानप्रमाण से भी ढढ कर रहे श्रीवस्रिष्ठजी दो श्लोकों से प्रकरण का
उपसंहार करते हैं।
ये द्वैतदृष्टिवाली (द्वैतदर्शनवाली) सृष्टियाँ मिथ्या दृष्टियाँ हैं, क्योंकि मोहदष्टियाँ हैं
यानी अज्ञान से उनका दर्शन होता है । ऐन्द्रजालिक की केवल माया का दर्शन करनेवाले की
भ्रान्ति (उसमें सत्यत्वभ्रम) सबको होती है और स्वप्न में जिनका अनुभव होता है, वे पदार्थ
अर्थशून्य हैं, यह भी सबको प्रसिद्ध है