Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
स्वप्नानुभूतय इमा मरणान्तबोधे भ्रान्त्येतरभ्रमदृशः स्फुटसर्गभासः ।
भान्त्यातिवाहिकशरीरगताः समस्ता मिथ्योदिता मृगनदीसरणक्रमेण ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व -पूर्व पदार्थों के भेदरूपी भ्रम का दर्शन
करनेवाले पुरुष में दृढ़तर भेदसंस्कार का उदय होने से प्राणों के उत्क्रमण के पूर्व क्षण में उत्पन्न
भावी भोगों के अनुकूल पदार्थों की प्रतीति होने पर बिलकुल स्पष्ट जो ये सृष्टिकी प्रतीतियाँ हैं,
ये यद्यपि केवल मनोमात्रनिष्ठ हैं, तथापि मृगतृष्णा की नदी के प्रवाह की नाईं मिथ्या उदित हुई
हैं और भ्रान्ति से बाह्य-सी प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में मन के बाहर नहीं हैं ।