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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 23–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verses 23–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 23,24

संस्कृत श्लोक

मज्जयायागते देव्यौ जयतां जीवनप्रदे । इह पूर्वमहं प्राप्ता भवत्योर्मार्गशोधिनी ॥ २३ ॥ इत्युक्तवत्यां तस्यां ता मानिन्यो मत्तयौवनाः । उपाविशन्विष्टरेषु लतामेरुशिरःस्विव ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे देवियों, आप मेरी विजयके लिए यानी कल्याणके लिए आई हैं और आप जीवन देनेवाली हैं आपकी जय हो । आपकी सेविका मैं यहाँ पर पहले प्राप्त हुई हूँ। उसके ऐसा कहने पर पूर्ण यौवनवाली वे तीनों मानिनियाँ जैसे मेरूके शिखरों में लताएँ बैठती हैं, वैसे ही सोने के आसनों पर बैठ गई