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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

चन्द्रबिम्बादिवोत्कीर्णं धौतं हेमद्रवैरिव । ज्वालाया द्रवशीतायास्तत्प्रभाद्रवभित्तिमत् ॥ २१ ॥ गृहमालोक्य पुरतो लीलाज्ञप्ती विलोक्य ते । उत्थाय संभ्रमवती तयोः पादेषु सापतत् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

द्रव से शीतल दीप्ति के कारण चन्द्रमा के बिम्बसे निकाले गये-से और उनकी कान्तिरूपी द्रवसे युक्त भित्तिवाला होनेके कारण सोने के द्रव से (पानी से) धोये गये-से घर को देखकर और आगे लीला और सरस्वती देवीजी को देखकर बड़े वेगसे उठकर वह उनके चरणोंपर गिर पड़ी