Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
क्रमादङ्गानि सर्वाणि सरसानि चकाशिरे ।
तस्य पुष्पाकर इव लताजालानि भूभृतः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके सब अंग सरस (हरेभरे) होकर
ऐसे शोभित होने लगे, जैसे कि पर्वत की लताएँ वसन्त आने पर शोभित होती हैँ