Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 4–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verses 4–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 4-7
संस्कृत श्लोक
शृणु देहस्य किंवृत्तं तवेह वरवर्णिनि ।
शरीरं तव पक्षेण तत्क्लिन्नं बाष्पतां गतम् ॥ ४ ॥
निर्जीवं पतितं भूमौ संशुष्कमिव पल्लवम् ।
काष्ठकुड्योपमो जातः शवस्तु हिमशीतलः ॥ ५ ॥
ततो मन्त्रिभिरागत्य मृतैवेयमिति स्वयम् ।
क्लेदालोकाद्विनिर्णीय भूयो निष्कासितं गृहात् ॥ ६ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन नीत्वा चन्दनदारुभिः ।
चितौ संक्षिप्य सघृतं सहसा भस्मसात्कृतम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
चिता में रखकर घृत के साथ उसे सहसरा जला डाला