Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 59, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 59, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
पट्टवासःशरन्मेघवितानकवितानकम् ।
वराङ्गनामुखैर्नृत्यच्चन्द्रलक्षगृहाजिरम् ॥ १० ॥
परलोकादुपानीता राज्ञी सा पतिरेव च ।
इति निर्वृत्तगाथाभिर्जगुर्देशान्तरे जनाः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर शरत्काल के तुल्य सफेद रेशमी वस्त्रो के चँदवे तने थे,
रूपवती ललनाओं के मुखों से उक्त महल के आँगनों में लाखों चन्द्रमा नाच रहे थे यानी
सुन्दरियों के प्रतिबिम्बित मुखरूपी लाखों चन्द्रमा उसके आँगन में नाच रहे थे । पूर्व लीला
परलोक से रानी को यानी दूसरी लीला को और महाराज पद्म को लाई। इस प्रकार की सैकड़ों
प्रबन्धों के रूप में प्रस्तुत गाथाओं का देश देशान्तर में लोग गान करते थे