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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 59, Verses 12–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 59, verses 12–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

पद्मो भूमिपतिः श्रुत्वा वृत्तान्तं कथितं मनाक् । चक्रे स्नानं समानीतैश्चतुःसागरवारिभिः ॥ १२ ॥ ततोऽभिषिषिचुर्विप्रा मन्त्रिणो भूभुजश्च तम् । लब्धोदयमनन्तेहममरेन्द्रमिवामराः ॥ १३ ॥ लीला लीला च राजा च जीवन्मुक्तमहाधियः । रेमिरे पूर्ववृत्तान्तकथनैः सुरतैरिव ॥ १४ ॥ सरस्वत्याः प्रसादेन स्वपौरुषकृतेन तत् । प्राप्तं लोकत्रयश्रेयः पद्मेनेति महीभुजा ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

को पूर्वोक्त रीति से सरस्वती के प्रसाद से और अपने पौरुष से वह तीनों लोकों का कल्याण प्राप्त हुआ । राजा ने जो सरस्वती की प्रसन्नता, पुनर्जीवन और राज्य प्राप्त किया, वह तो दैव से ही मिला, अपने पौरुष से मिला नहीं, ऐसी श्रीरामचन्द्रजी की शंका को ताडकर श्रीवसिष्ठजी की यह उक्ति हे । सरस्वती की आराधना आदिरूप अपने पौरुष से सरस्वती का प्रसाद प्राप्त हुआ। उसका प्रसाद काकतालीय के समान आकस्मिक नहीं है, यह भाव है