Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 13–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 13-15

संस्कृत श्लोक

स सर्गत्रितये कालो लीलाभर्तुर्हि योगतः । स क्वचित्किमहोरात्रः क्वचित्किं मासमात्रकः ॥ १३ ॥ क्वचित्किं बहुवर्षाणि कस्यचित्किमु पेलवः । कस्यचित्किं महादीर्घः कस्यचित्किं क्षणः स्थितः ॥ १४ ॥ इति मे भगवन्बूहि त्वं यथावदनुग्रहात् । सकृच्छ्रुतं न विश्रान्तिमेति लोष्टे यथा जलम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

वह पूर्वोक्त काल, जो लीला के पति के तीन जन्मों में बीता, वह कहीं तो (गिरिग्राम में तो) आठ दिन-रात रूप कहा गया है, कहीं (पद्म-जन्म में) एकमासरूप कहा गया है, कहीं (विदूरथजन्म में) बहुत वर्षवाला कहा गया है, इस प्रकार क्या विभिन्‍न ब्रह्माण्ड हैं या एक ही ब्रह्माण्ड में मनुष्यों का वर्ष, देवताओं का दिन (अति अल्पकाल) होता है, किसीको (क्षुद्र जन्तुओं को) वह बड़ा विशाल प्रतीत होता है, और किसीको (ब्रह्माको) क्षण प्रतीत होता है, यों क्या एक ही काल, देश, लोग आदि के भेद से विरुद्धरूप से (छोटे बड़े रूप से) स्थित है क्या ? पदार्थसत्ता के एकरूप होने पर प्रतीति में भेद कैसे आता है ? यह भाव है। हे भगवन्‌, यह सब आप अनुग्रहपूर्वक यथार्थरूप से मुझसे कहें, जैसे ढेले में गिरा हुआ जलबिन्दु कहीं विलीन हो जाता है, वैसे ही 'देशदै्घ्य यथा नास्ति कालदैघ्घ्य तथेव हि' इत्यादि से आपके कह चुकनेपर भी एक बार के श्रवण से वह स्थिरता को नहीं प्राप्त होता हे