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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 16, 17

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । येन येन यथा यद्यद्यदा संवेद्यतेऽनघ । तेन तेन तथा तत्तत्तदा समनुभूयते ॥ १६ ॥ अमृतत्वं विषं याति सदैवामृतवेदनात् । शत्रुर्मित्रत्वमायाति मित्रसंवित्तिवेदनात् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि जैसी पदार्थों की सत्ता है, उसीके अनुसार प्रतीति हो, तो यह विरोध हो सकता है, अनिर्वचनीय पदार्थों की सत्ता ही प्रतीति के अनुसारिणी होती है उसमें जितने द्रष्टा (देखने वाले) हैं, उनके प्रति पदार्थ भिन्न भिन्न होते हैं, कालवैषम्यरूपभेद नहीं है, इस आशय से श्रीवसिष्टजी उत्तर देते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जिस-जिस पुरुष को जिस समय जिस प्रकार से जिस- जिस पदार्थ की प्रतीति होती है, वह-वह उस समय उस प्रकार से उस-उस पदार्थ का अनुभव करता है। सदा ही यह जीवन का साधन है, यह ज्ञात होने से विष भी अमृतता को प्राप्त होता है, देखिये न यह हमारे जीवन का साधन है, इस प्रकार की दढ प्रतीति होने से विष के कीड़े विष से ही जीते हैं, यदि कहिये कि प्रमाद से यह हमारा खाद्य है, यह सोचकर जो आदमी विष खा लेता है, वह क्यों मरता है ? सुनिये, विष के कीड़ों की नाई उसका विष में यह हमारा जीवन का साधन है, ऐसा चिरकाल से दृढ विश्वास नहीं है, दूसरी बात यह भी है कि उसको ऐसा पक्का संस्कार रहता है कि विष खाने से मृत्यु होती है । विष में जीवनसाधनता के दृढ़ निश्चय का अभाव और मरणहेतुता का निश्चय होने से उसकी मृत्यु होती है। यह मित्र है, ऐसी दृढभावना करने से शत्रु भी मित्रता को प्राप्त हो जाता है